भगवान सत्यनारायण की कथा कलयुग में भगवान विष्णु के सबसे सरल, प्रभावशाली और लोकप्रिय स्वरूप की पूजा है। 'सत्य' ही नारायण है और 'नारायण' ही सत्य है—यही इस कथा का मूल मंत्र है।
यह भगवान विष्णु के 'सत्य' स्वरूप की महिमा का गान है।
शास्त्रों में वर्णन: इसका विस्तृत वर्णन स्कंद पुराण के रेवाखंड में मिलता है।
सर्वप्रथम प्रारंभ: पौराणिक कथा के अनुसार, जब महर्षि नारद ने मृत्युलोक (पृथ्वी) के प्राणियों को कष्ट में देखा, तब उन्होंने भगवान विष्णु से उपाय पूछा। भगवान विष्णु ने स्वयं नारद जी को इस व्रत का विधान बताया।
प्रथम श्रोता: भगवान विष्णु ने यह कथा सबसे पहले देवर्षि नारद को सुनाई थी। पृथ्वी पर इसे सर्वप्रथम शतानंद नामक एक निर्धन ब्राह्मण ने किया था।
सत्यनारायण कथा के लिए कोई भी दिन शुभ है, लेकिन कुछ विशेष तिथियों पर इसका फल अनंत गुना बढ़ जाता है:
पूर्णिमा: हर माह की पूर्णिमा को यह कथा करना सर्वोत्तम माना जाता है।
संक्रांति: सूर्य के राशि परिवर्तन के दिन।
विशेष अवसर: गृह प्रवेश, विवाह, संतान जन्म, जन्मदिन, नौकरी में पदोन्नति या किसी भी नई शुरुआत पर।
संकल्प पूर्ति: किसी विशेष मनोकामना के पूरा होने पर 'मन्नत' के रूप में।
धार्मिक लाभ: अनजाने में हुए पापों का शमन, सुख-समृद्धि और अंततः मोक्ष की प्राप्ति।
सामाजिक लाभ: इस कथा में 'प्रसाद' का वितरण और सामूहिक श्रवण अनिवार्य है, जो समाज में समरसता और भाईचारा बढ़ाता है।
मनुष्य जीवन में उपयोगिता: यह कथा सिखाती है कि सत्य के मार्ग पर चलने से निर्धन भी धनी और दुखी भी सुखी हो सकता है (जैसा कि लकड़हारे और साधु वैश्य की कथा में वर्णित है)।
ब्राह्मण: इस पूजा को सामान्यतः एक योग्य विद्वान ब्राह्मण द्वारा संपन्न कराया जा सकता है।
नियम:
व्रती को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
कलश स्थापना और पंचामृत (दूध, दही, घी, चीनी, शहद) का भोग अनिवार्य है।
केले के पत्तों का मंडप और पंजीरी (भुना हुआ आटा और चीनी) का प्रसाद मुख्य है।
कथा के पांचों अध्यायों को शांतिपूर्वक सुनना और अंत में आरती व सामूहिक भोज करना आवश्यक है।
इस कथा का प्रचलन इसकी सरलता के कारण बढ़ा। इसमें न तो बहुत कठिन मंत्रों की आवश्यकता है और न ही बहुत महंगे साधनों की। भक्ति और सत्य के प्रति निष्ठा ही मुख्य है, इसलिए यह जन-जन में लोकप्रिय हो गई।
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