बृहस्पतिवार (गुरुवार) का व्रत भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है। यह व्रत सुख, संपत्ति, विद्या और वैवाहिक आनंद की प्राप्ति के लिए अचूक माना जाता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह दिन 'बृहस्पति ग्रह' (Jupiter) का माना जाता है। बृहस्पति को सभी ग्रहों का 'गुरु' कहा जाता है, जो ज्ञान, धर्म, और विस्तार के कारक हैं।
शुभ समय: किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से इस व्रत को शुरू करना चाहिए। (पौष के महीने में इसे शुरू नहीं करना चाहिए)।
अवधि: लोग अक्सर 16 गुरुवार का व्रत रखते हैं और 17वें गुरुवार को उद्यापन करते हैं।
किसे करना चाहिए:
जिनके विवाह में बाधा आ रही हो।
विद्यार्थी जिन्हें एकाग्रता और ज्ञान की आवश्यकता है।
जो आर्थिक तंगी से जूझ रहे हों।
संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्ति।
गुरुवार के व्रत में शुद्धता और पीले रंग का विशेष महत्व है:
पीला रंग: इस दिन पीले वस्त्र पहनें, पीले फूलों से पूजा करें और भगवान को पीला चंदन लगाएं।
केले के वृक्ष की पूजा: इस व्रत में केले के पेड़ की पूजा का विशेष विधान है। जल चढ़ाएं, चने की दाल और गुड़ का भोग लगाएं।
वर्जनाएं: इस दिन सिर धोना, कपड़े धोना, बाल काटना, नाखून काटना और घर का जाला साफ करना वर्जित माना गया है। ऐसा माना जाता है कि इससे गुरु ग्रह कमजोर होता है और लक्ष्मी घर से चली जाती हैं।
क्या खाएं: दिन में एक समय भोजन करें। भोजन में पीली वस्तुओं का सेवन करें (जैसे- बेसन का हलवा, पीले चावल, चने की दाल)।
क्या न खाएं: इस व्रत में नमक का सेवन वर्जित है। साथ ही, चूंकि केले के पेड़ की पूजा होती है, इसलिए इस दिन केला खाना वर्जित माना जाता है।
कथा के अनुसार, एक प्रतापी राजा था जो बहुत दानी था, लेकिन उसकी रानी को दान देना और धर्म-कर्म पसंद नहीं था। एक दिन भगवान विष्णु साधु का भेष धारण कर आए और रानी से भिक्षा मांगी। रानी ने कहा कि वह दान से तंग आ चुकी है और ऐसा उपाय चाहती है जिससे उसका सारा धन नष्ट हो जाए ताकि वह आराम कर सके।
साधु (भगवान) ने उसे गुरुवार के दिन वे सभी कार्य करने को कहे जो शास्त्रों में वर्जित हैं (बाल धोना, घर लीपना आदि)। सात गुरुवार के भीतर राजा का सारा राज-पाठ छिन गया और वे दरिद्र हो गए। बाद में जब रानी को अपनी भूल का एहसास हुआ, तो उसने फिर से विधि-विधान से गुरुवार का व्रत किया और भगवान की कृपा से उसका सुख-सौभाग्य वापस लौट आया।
बृहस्पतिवार व्रत का महात्म्य 'पद्म पुराण' और 'स्कंद पुराण' में विस्तृत रूप से मिलता है। ऋग्वेद में बृहस्पति को 'ब्रह्मणस्पति' कहा गया है, जो प्रार्थनाओं और मंत्रों के अधिपति हैं। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, गुरु की कृपा के बिना मनुष्य को पूर्ण सुख और ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।
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नोट :व्रत कथा पूजन सेवा राशि 1500 है जिसमे पंडित जी पूजन व कथा करेंगे |
Note: Vrat Katha Pooja Seva Rashi is 1500 in which Pandit ji will do the puja and katha.
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