श्राद्ध कर्म दक्षिणा-15000 (पूजन सामग्री और आचार्य खर्च सहित)
Shraddha Karma Dakshina- 15000 (including puja material and Acharya expenses)
त्रिपिंडी श्राद्ध: पितृ दोष मुक्ति और अतृप्त आत्माओं की शांति का महापुण्य
त्रिपिंडी श्राद्ध एक विशेष 'काम्य श्राद्ध' है। जब सामान्य वार्षिक श्राद्ध या तर्पण से पितरों की तृप्ति नहीं होती, तब त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। यह मुख्य रूप से उन पूर्वजों के लिए है जिनकी मृत्यु अस्वाभाविक हुई हो या जिन्हें तीन पीढ़ियों से जल-तिल न मिला हो।
'त्रिपिंडी' का अर्थ है—तीन पिंडों का दान। ये तीन पिंड ब्रह्मा (रजोगुण), विष्णु (सत्वगुण) और रुद्र (तमोगुण) के प्रतीक होते हैं।
शास्त्रों में उल्लेख: इसका विस्तृत वर्णन 'गरुड़ पुराण', 'श्राद्ध कल्पलता' और 'निर्णय सिंधु' में मिलता है। वेदों में पितरों को 'अर्यमा' देव के रूप में पूजनीय माना गया है।
स्थान: यह पूजा मुख्य रूप से त्रयंबकेश्वर (नासिक), काशी (वाराणसी) और गया में करने का विधान है।
इस श्राद्ध को करने से जातक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
वंश वृद्धि: पितृ दोष के कारण संतान प्राप्ति में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
ग्रह क्लेश से मुक्ति: परिवार में बेवजह के झगड़े और अशांति समाप्त होती है।
आर्थिक उन्नति: व्यापार में स्थिरता आती है और 'बरकत' लौटती है।
मानसिक शांति: पूर्वजों के आशीर्वाद से घर का वातावरण सकारात्मक होता है।
अतृप्त आत्माओं को गति: परिवार के वे सदस्य जिनकी अकाल मृत्यु हुई (दुर्घटना, रोग आदि), उन्हें मोक्ष मिलता है।
| विवरण | विस्तृत जानकारी |
| अवधि | यह पूजा केवल 1 दिन (लगभग 3-4 घंटे) में संपन्न होती है। |
| मुख्य मंत्र | "ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:॥" |
| जप संख्या | पितृ गायत्री और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया जाता है। विशिष्ट मंत्रों का 1100 जप होता है। |
| ब्राह्मण संख्या | मुख्य रूप से 1 या 2 विद्वान ब्राह्मणों द्वारा यह विधि पूर्ण की जाती है। |
| तीन पिंड | जौ के आटे (सत्व), चावल (रज) और काले तिल (तम) के तीन पिंड बनाए जाते हैं। |
इसका उद्गम धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान कृष्ण के संवाद से माना जाता है। महाभारत युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर को अपने परिजनों की अतृप्त आत्माओं के स्वप्न आते थे, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें त्रि-देवों की साक्षी में 'त्रिपिंडी श्राद्ध' करने का मार्ग बताया था। एक अन्य व्याख्यान के अनुसार, ऋषि भृगु ने पितरों की पीड़ा देख कर इस विधि का विस्तार किया ताकि कलयुग के मनुष्य अपने पूर्वजों को 'प्रेत योनि' से मुक्त करा सकें।
त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए गया,काशी या त्रयंबकेश्वर जाना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। Kaivalya Astro ऐप इस बाधा को दूर करता है:
पंजीकरण: ऐप पर 'Astro service' या 'Tripindi Shradh' विकल्प चुनें।
विशेषज्ञ चयन: काशी या नासिक के अनुभवी तीर्थ पुरोहितों का चुनाव करें।
लाइव संकल्प: पंडित जी वीडियो कॉल के माध्यम से आपके और आपके दिवंगत पूर्वजों के नाम का लाइव संकल्प करवाएंगे।
लाइव दर्शन: आप अपने घर के पूजा स्थान पर बैठकर फोन के माध्यम से पूरी पिंड दान प्रक्रिया, मंत्रोच्चार और तर्पण को लाइव देखेंगे।
गौ सेवा: पूजा के अंत में ब्राह्मण भोजन और गौ सेवा का लाइव प्रमाण दिया जाता है, जो श्राद्ध की पूर्णता के लिए अनिवार्य है।
स्मृति चिन्ह: पूजा के बाद गंगाजल या भस्म आपके पते पर भेज दी जाती है।
उचित समय: त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए पितृ पक्ष, अमावस्या, या अष्टका तिथि सबसे उत्तम है।
पात्रता: विवाहित या अविवाहित, पुरुष या महिला (यदि घर में कोई पुरुष न हो), सभी पितरों की शांति के लिए यह पूजा करवा सकते हैं।
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