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नाग वासुकि साधना
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अनुष्ठान शुल्क- 21000(सम्पूर्ण सामग्री और ब्राह्मण खर्च सहित)

घर पर करवाने पर मार्ग के आने जाने का व्यय और रहने की व्यवस्था यजमान की रहेगी 

If the house is being arranged, the travel expenses and accommodation will be borne by the host. 

नाग वासुकि साधना: सर्पराज की कृपा और राहु-केतु दोषों से मुक्ति का महाअनुष्ठान

तंत्र और पुराणों में नाग वासुकि को नागों का राजा और भगवान शिव का परम आभूषण माना गया है। वासुकि नाग केवल एक पौराणिक जीव नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के स्तंभ हैं, जिन्होंने समुद्र मंथन के समय मथानी की रस्सी (नेति) बनकर देवताओं और असुरों की सहायता की थी।


1. पूर्ण परिचय और शास्त्रीय आधार

1. Complete introduction and scriptural basis

नाग वासुकि साधना पाताल लोक के अधिपति की आराधना है। वासुकि नाग को भगवान शिव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर अपने गले में धारण किया था।

  • शास्त्रीय उल्लेख: इसका विस्तृत वर्णन 'महाभारत' (आदि पर्व), 'स्कंद पुराण' और 'विष्णु पुराण' में मिलता है। 'अथर्ववेद' में सर्प विद्या के अंतर्गत वासुकि नाग की शक्तियों का उल्लेख है। प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में 'नाग वासुकि मंदिर' को इस साधना का मुख्य केंद्र माना जाता है।

  • उद्गम कथा: समुद्र मंथन के समय जब मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया, तब वासुकि नाग ने स्वयं को रस्सी के रूप में प्रस्तुत किया। मंथन के दौरान निकलने वाले 'हलाहल' विष की ज्वाला को सहने के कारण भगवान शिव ने उन्हें अपने गले में स्थान दिया। तभी से "नाग वासुकि साधना" शिव और शक्ति की सुरक्षात्मक ऊर्जा प्राप्त करने का मार्ग बन गई।


2. साधना के लाभ (Benefits of Sadhna)

  1. कालसर्प दोष निवारण: यदि कुंडली में राहु-केतु के कारण प्रगति रुकी हो, तो यह साधना उस बंधन को काटती है।

  2. विष और भय से मुक्ति: अज्ञात भय, बुरे सपने और शत्रुओं द्वारा किए गए 'अभिचार' (तंत्र प्रयोग) का प्रभाव समाप्त होता है।

  3. कुण्डलिनी जागरण: योग शास्त्र में वासुकि को मूलाधार शक्ति का प्रतीक माना गया है, जो आध्यात्मिक चेतना बढ़ाती है।

  4. वंश रक्षा: परिवार में होने वाली अकाल मृत्यु और 'सर्प दोष' (जो संतान प्राप्ति में बाधा डालता है) को शांत करती है।

  5. भूमि और भवन लाभ: नागों को भूमि का स्वामी माना जाता है, अतः निर्माण कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।


3. साधना का विस्तृत विधान (समय, ब्राह्मण और संख्या)

3. Detailed procedure for Sadhana (time, brahmin and number)

नाग वासुकि साधना अत्यंत अनुशासित और शुचिता की मांग करती है।

  • साधना की अवधि: यह साधना सामान्यतः 1 दिन (विशेष शांति हेतु) 

  • ब्राह्मणों की संख्या:

    • 3 ब्राह्मण: एक आचार्य और दो जपकर्ता (सामान्य शांति के लिए)।

  • मंत्र जाप की संख्या: पूर्ण अनुष्ठान में 21,000  मंत्रों का जाप होता है। 

  • शुद्ध मंत्र:

    "ॐ नागराजाय विद्महे पशुपति भूषणाय धीमहि तन्नो वासुकि: प्रचोदयात्॥" (नाग वासुकि गायत्री)

    मूल मंत्र: "ॐ ह्रीं वासुकि नागराजाय नमः"


4. कैवल्य एस्ट्रो (Kaivalya Astro) ऐप पर लाइव पूजा विधि

4. Live Puja Vidhi on Kaivalya Astro App

कैवल्य एस्ट्रो ऐप आपको प्रयागराज या त्रयंबकेश्वर के सिद्ध सिद्धपीठों से जोड़कर यह साधना लाइव संपन्न करवाता है:

  1. दोष विश्लेषण: ऐप के माध्यम से ज्योतिषाचार्य आपकी कुंडली देखकर यह तय करते हैं कि आपको 'नाग बलि' की आवश्यकता है या केवल 'वासुकि शांति' की।

  2. लाइव संकल्प: आप अपने घर में पवित्र स्थान पर बैठते हैं और आचार्य वीडियो कॉल के जरिए आपके नाम और गोत्र के साथ लाइव संकल्प करवाते हैं।

  3. अभिषेक दर्शन: नाग वासुकि की चांदी की प्रतिमा या विग्रह पर दूध, जल और चंदन से होने वाला 'नाग अभिषेक' आप अपने फोन पर लाइव देखते हैं।

  4. मंत्र शक्ति: ब्राह्मणों द्वारा किए जा रहे  जाप की ऊर्जा का अनुभव आप लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान कर सकते हैं।

  5. विसर्जन और प्रसाद: पूजा के अंत में चांदी के नाग-नागिन के जोड़े का नदी में विसर्जन (प्रतीकात्मक) लाइव दिखाया जाता है और सिद्ध 'नाग पाश यंत्र' आपके घर भेजा जाता है।


5. भक्त के द्वारा उद्गम का व्याख्यान

5. Explanation of the origin by a devotee

प्राचीन काल में राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने जब 'सर्प सत्र यज्ञ' किया था, तब आस्तिक मुनि ने वासुकि और अन्य नागों की रक्षा की थी। वासुकि नाग ने आस्तिक मुनि की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि जो भी मनुष्य निष्काम भाव से नागराज वासुकि की आराधना करेगा, उसे कभी भी सर्प भय (काल का भय) नहीं सताएगा।


6. साधना के विशेष नियम

6. Special rules of sadhana

  • भूमि शयन: साधना के दिनों में जमीन पर सोना शुभ माना जाता है।

  • वर्जित भोजन: लहसुन, प्याज और मांसाहार का पूर्ण त्याग करें।

  • दिशा: पूजा के समय मुख पूर्व या उत्तर-पूर्व की ओर होना चाहिए।

  • विशेष तिथि: पंचमी तिथि (नागपंचमी) या शिवरात्रि इस साधना के लिए सर्वोत्तम है।

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