Siddh Rakt Gunja Mala 108 Beads | Red Gunja Japa Mala for Mantra Jaap, Meditation, Puja & Spiritual Prayer
रक्त गुंजा की माला (Red Gunja Mala) को 'चिरमी के दाने' भी कहा जाता है। तंत्र शास्त्र और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इन बीजों में दैवीय शक्तियां वास करती हैं। इन्हें माता लक्ष्मी और भगवान हनुमान का आशीर्वाद प्राप्त माना जाता है।
रक्त गुंजा एक औषधीय पौधे (Abrus precatorius) के बीज होते हैं। ये बीज गहरे लाल रंग के होते हैं और इनके एक सिरे पर एक प्राकृतिक काला निशान होता है। इसे 'लाल चिरमी' भी कहा जाता है। लोक कथाओं के अनुसार, गुंजा के बीज अपने मालिक से प्रेम करते हैं और संकट आने पर अपना रंग भी बदल सकते हैं।
प्राकृतिक बीज: यह पूरी तरह से प्राकृतिक होती है। यह जंगल में पाई जाने वाली लताओं की फलियों से प्राप्त होती है।
संयोजन: इन लाल-काले बीजों को चुनकर साफ किया जाता है। चूंकि ये बीज काफी सख्त होते हैं, इसलिए इनमें बारीक छेद करके इन्हें अक्सर लाल धागे में पिरोया जाता है।
संरचना: इसमें आमतौर पर 108 दाने होते हैं, लेकिन सुरक्षा या नजर दोष के लिए इसे छोटे कंगन या 27/54 दानों की माला के रूप में भी बनाया जाता है।
रक्त गुंजा की माला को ऊर्जावान बनाकर ही धारण करना चाहिए:
शुभ समय: इसे मंगलवार या शुक्रवार के दिन धारण करना सबसे उत्तम माना जाता है।
शुद्धिकरण: माला को गंगाजल से शुद्ध करें और फिर उसे लाल कपड़े पर रखें।
पूजन: हनुमान जी के चरणों में इसे स्पर्श कराएं। सिंदूर और अक्षत (चावल) अर्पित करें।
मंत्र जाप: 'ॐ हं हनुमते नमः' का 108 बार जाप करें।
धारण: पूजन के बाद इसे गले में धारण करें या दाहिनी कलाई पर बांधें।
नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा: यह नजर दोष, जादू-टोना और किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्ति से सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है।
आर्थिक लाभ: इसे धन स्थान या तिजोरी में रखने से लक्ष्मी का आगमन होता है और व्यापार में उन्नति मिलती है।
शत्रु विजय: यह धारण करने वाले के आत्मविश्वास को बढ़ाती है और शत्रुओं के प्रभाव को कम करती है।
संकट निवारण: हनुमान जी की कृपा होने के कारण यह अचानक आने वाले संकटों और दुर्घटनाओं से रक्षा करती है।
ग्रह दोष: मंगल ग्रह और राहु-केतु के अशुभ प्रभावों को शांत करने में इसे बहुत सहायक माना जाता है।
सिद्ध करने की अवधि: किसी योग्य ब्राह्मण या तांत्रिक विद्वान द्वारा इस माला की प्राण-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया केवल 1 दिन (एक ही बैठक) में पूर्ण हो जाती है।
विशेष अनुष्ठान: ब्राह्मण इसे किसी विशेष मुहूर्त में विशेष मंत्रों के हवन के माध्यम से जाग्रत करते हैं। विधि विधान से की गई इस एक दिन की पूजा के बाद माला पूर्ण रूप से सिद्ध हो जाती है।
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सूर्य कान्त द्विवेदी:
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