यह साधना प्राचीन तांत्रिक विद्याओं पर आधारित है, जिसका उद्देश्य नकारात्मक ऊर्जाओं, प्रेत बाधाओं और शत्रु के तंत्र प्रयोगों से सुरक्षा प्रदान करना है। इस साधना के माध्यम से न केवल संकटों का निवारण होता है, बल्कि साधक को एक अभेद्य सुरक्षा कवच भी प्राप्त होता है।
आसन (Seat): पीले रंग का (हल्दी से रंगा हुआ) आसन।
वस्त्र (Attire): साधना काल में पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र।
माला (Rosary): हल्दी की गांठों से तैयार की गई माला।
लेखन उपकरण (Pen): जामुन के पेड़ की लकड़ी से बनी कलम।
स्याही (Ink): अष्टगंध की स्याही।
आधार पत्र (Medium): शुद्ध भोजपत्र अथवा बिना लाइन वाला सफेद कागज।
| चरण (Phase) | क्रिया (Action) | विस्तृत विवरण (Detailed Description) |
| 01 | दिशा एवं आसन | साधना के समय मुख पूर्व दिशा की ओर रखें। पीले आसन पर बैठकर हल्दी की माला से जप प्रारंभ करें। |
| 02 | मंत्र सिद्धि | मंत्र को जाग्रत करने हेतु 11,000 (ग्यारह हजार) बार जप अनिवार्य है। इसके बाद मंत्र आपके अनुरूप कार्य करने में सक्षम हो जाता है। |
| 03 | संकट निवारण | मंत्र सिद्ध होने के पश्चात, किसी भी आकस्मिक संकट के समय 108 बार जप करने से बाधाएं तुरंत टल जाती हैं। |
| 04 | सुरक्षा कवच (ताबीज) | जामुन की कलम और अष्टगंध से भोजपत्र पर मंत्र लिखें। इसे ताबीज में भरकर गले में धारण करने से प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है। |
| 05 | यात्रा सुरक्षा | विशेष कार्य हेतु यात्रा पर जाते समय, रविवार (पुष्य नक्षत्र) को यह लिखित ताबीज साथ रखें। इससे यात्रा निर्भय और सफल होती है। |
मानसिक शुद्धि: साधना काल के दौरान पूर्ण मानसिक पवित्रता, सात्विकता और एकाग्रता बनाए रखना अनिवार्य है।
प्रभाव: यह यंत्र सिद्ध होने के बाद 2 वर्ष तक गंभीर से गंभीर तांत्रिक प्रयोगों से शरीर की सुरक्षा करता है।
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