## त्रिकालदर्शी सिद्धि एवं तृतीय नेत्र जागरण: माँ काली की विशेष साधना
यह साधना उन साधकों के लिए है जो योग शास्त्र की कठिन क्रियाओं के बिना, मंत्र शक्ति के माध्यम से अपने शरीर के षट्चक्रों (छह चक्रों) को जाग्रत कर त्रिकालदर्शी बनने की इच्छा रखते हैं। जब व्यक्ति का आज्ञा चक्र (तीसरा नेत्र) खुल जाता है, तो उसे भूत, भविष्य और वर्तमान का स्पष्ट ज्ञान होने लगता है।
### साधना के दो मुख्य स्तंभ: सिद्ध मंत्र
इस साधना में दो मंत्रों का प्रयोग किया जाएगा:
1. विनियोग एवं पूजन मंत्र (लघु मंत्र):
> "क्रीं ह्रीं स्रीं हूं फट्"
>
* इस मंत्र का उपयोग अंग न्यास, कर न्यास और माँ काली के षोडशोपचार पूजन (धूप, दीप, नैवेद्य) के लिए किया जाएगा।
2. मुख्य सिद्धि मंत्र (दीर्घ मंत्र):
> "ॐ हे कपालिनि कुल कुण्डलिनी सिद्धि देहि भाग्यम् देहि देहि स्वाहा"
>
* इस मंत्र का मुख्य जप अनुष्ठान किया जाना है।
### साधना की तैयारी और नियम
इस साधना की सफलता पूर्णतः एकाग्रता और नियमों के पालन पर टिकी है।
* समय: रात्रि 9:00 बजे से साधना का प्रारंभ करें।
* अवधि: यह साधना 90 दिनों की अखंड साधना है।
* दिशा: मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
* वस्त्र एवं आसन: साधक को काले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए और काले आसन का प्रयोग करना चाहिए।
* दीपक: तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
* स्थान: घर का कोई एकांत कमरा, श्मशान भूमि या कोई अन्य पवित्र स्थान जहाँ कोई टोकने वाला न हो।
### दैनिक विधि (Step-by-Step)
1. माँ काली का पूजन:
सर्वप्रथम लघु मंत्र (क्रीं ह्रीं स्रीं हूं फट्) से न्यास करें और माँ काली का ध्यान करें। इसी मंत्र से धूप, दीप और भोग अर्पित कर माता का पूजन संपन्न करें।
2. मुख्य जप:
पूजन के पश्चात मुख्य मंत्र का नित्य 5100 बार (51 माला) जप करें। जप के दौरान मन पूरी तरह एकाग्र होना चाहिए।
3. दैनिक हवन:
जप संपन्न होने के बाद, उसी स्थान पर शुद्ध घी से 108 बार आहुति देकर संक्षिप्त हवन करें।
4. शयन:
साधना काल के दौरान (90 दिन) साधक को उसी स्थान पर भूमि शयन करना अनिवार्य है।
### साधना के अनिवार्य नियम (परहेज)
साधना की ऊर्जा को सुरक्षित रखने के लिए इन नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है:
* ब्रह्मचर्य: पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। वैवाहिक संबंध या शारीरिक स्पर्श वर्जित है।
* शुद्ध आहार: मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का त्याग करें। तामसिक भोजन साधना में बाधक है।
* मौन एवं एकांत: जितना संभव हो कम बोलें और बाहरी लोगों के संपर्क से बचें।
### साधना का फल
जब यह साधना 90 दिनों तक विधि-विधान से पूर्ण की जाती है, तो शरीर के छह चक्र स्वतः ही क्रियाशील होने लगते हैं।
* तृतीय नेत्र का जागरण: दोनों भौंहों के बीच स्थित आज्ञा चक्र सक्रिय हो जाता है।
* त्रिकालदर्शिता: साधक को उन घटनाओं का आभास होने लगता है जो सामान्य आँखों से नहीं देखी जा सकतीं। धीरे-धीरे भूत, भविष्य और वर्तमान की सूक्ष्म परतें साधक के सामने खुलने लगती हैं।
> विशेष निर्देश: यह एक तीव्र साधना है। अतः पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और पवित्रता के साथ ही इसे आरंभ करें। अधूरा ज्ञान या नियमों में ढील सिद्धि में बाधक हो सकती है।
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