यह विधान प्राचीन तांत्रिक ग्रंथों के अत्यंत गोपनीय सूत्रों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी विशिष्ट स्थान या शत्रु के निवास पर नकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है। यह प्रक्रिया अत्यंत उग्र मानी जाती है और इसे केवल पूरी सावधानी एवं गोपनीयता के साथ ही संपन्न किया जाता है।
| Material Type | Description |
| Main Component (मुख्य सामग्री) | जंगली सूअर का दांत अथवा उसके मुख के सामने के हिस्से की पवित्र अस्थि। |
| Supporting Agents (सहायक द्रव्य) | बाबुल के शुद्ध बीज, विशेष वनस्पति का तीक्ष्ण कांटा, अथवा शुद्ध मदिरा। |
Phase 1: Material Integration (सामग्रियों का एकीकरण): सर्वप्रथम एक शुभ समय पर सभी सामग्रियों को एकत्र करें और उन्हें एक शुद्ध ताम्र (तांबे) या कांस्य पात्र में मिलाकर सुरक्षित स्थान पर रखें।
Phase 2: Timing & Muhurat (समय और सटीक मुहूर्त): यह प्रक्रिया अत्यंत उग्र है, अतः यह केवल अमावस्या की रात्रि को ही संपन्न की जाती है। अन्य किसी भी तिथि पर यह निष्फल मानी जाती है।
Phase 3: Activation (अभिमंत्रण एवं ऊर्जावान बनाना): एकांत स्थान पर उत्तर या पश्चिम की ओर मुख करके बैठें। पात्र को सामने रखें और मूल बंगाली मंत्र का 108 बार जप करें। प्रत्येक मंत्र की समाप्ति पर सामग्री पर फूंक मारें ताकि वह पूर्णतः अभिमंत्रित (सिद्ध) हो जाए।
Phase 4: Secret Placement (सामग्री की गुप्त स्थापना): अभिमंत्रित सामग्री को अत्यंत गोपनीयता के साथ शत्रु के घर की छत, छप्पर या ऊपरी हिस्से में इस प्रकार छिपा दें कि वह किसी की दृष्टि में न आए।
Phase 5: Effects (तांत्रिक प्रभाव एवं लक्षण): तंत्र शास्त्रों के अनुसार, इस प्रयोग के सफल होते ही लक्षित स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है, जिससे मानसिक अशांति और अन्य बाधाएं उत्पन्न होने की मान्यता है।
Phase 6: Protective Measure (सहायक प्रयोग - तेल/जल शोधन): सरसों के तेल और शुद्ध गंगाजल को इसी मंत्र से अभिमंत्रित करें। इसका उपयोग मुख्य क्रिया के प्रभाव को संतुलित करने तथा साधक की स्वयं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।
इस साधना की सफलता उच्चारण की शुद्धता और ध्वनि तरंगों पर निर्भर करती है।
(निर्देश: इस महामंत्र का पूर्ण अनुष्ठान अनिवार्य रूप से कुल 108 बार की संख्या में किया जाना आवश्यक है।)
तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, ऐसी क्रियाएं अत्यंत संवेदनशील होती हैं। इनका उपयोग करने से पूर्व साधक को अपनी मानसिक शुद्धि और सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। किसी भी प्रकार के नकारात्मक प्रयोगों का उद्देश्य किसी को अनावश्यक हानि पहुँचाना नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा और तंत्र निवारण तक सीमित रहना ही श्रेयस्कर माना जाता है।
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