यह तंत्र जगत का एक अत्यंत गोपनीय, उग्र और अचूक 'खान-पान क्रिया' मंत्र है। यह विद्या केवल तभी प्रयोग में लाई जानी चाहिए जब सभी अन्य मार्ग बंद हो चुके हों और आत्मरक्षा का प्रश्न अत्यंत गंभीर हो।
साधकों के लिए निर्देश: इस मंत्र का प्रयोग कभी भी उपहास, मजाक या केवल "परीक्षण" करने के उद्देश्य से न करें। यह अत्यंत शक्तिशाली और उग्र है। सामान्य वाद-विवाद, आपसी मनमुटाव या छोटी-मोटी रंजिश में इसका प्रयोग पूर्णतः वर्जित है। दुरुपयोग करने पर इसका विपरीत प्रभाव स्वयं साधक के लिए भारी संकट का कारण बन सकता है।
इस क्रिया का प्रभाव शत्रु पर साक्षात विनाशकारी होता है। इसके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:
तीव्र अग्नि दाह: पीड़ित व्यक्ति को एक साथ 100 चिताओं की अग्नि के समान तीव्र और असह्य ज्वर (बुखार) चढ़ जाता है।
असाध्य अवस्था: यह ज्वर इतना प्रबल होता है कि आधुनिक चिकित्सा या सामान्य औषधियों का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
मानसिक व्याकुलता: अत्यधिक ताप के कारण पीड़ित व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से पागलों जैसी स्थिति में पहुँच जाता है।
परिणाम: उचित समय पर तंत्र निवारण न होने पर पीड़ित व्यक्ति 1 से 1.5 महीने तक असह्य पीड़ा भोगता है। अत्यधिक दुर्बलता की स्थिति में यह मृत्यु का कारण भी बन सकता है।
इस क्रिया को संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री और प्रक्रिया का पालन आवश्यक है:
एक कली का लहसुन (1 पीस)
रुद्र पत्थर (थोड़ी मात्रा में)
काली मिर्च पाउडर (आवश्यकतानुसार)
मंत्र अभिमंत्रण: तीनों सामग्रियों को अपने सामने रखें। मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करते हुए, बीच में शत्रु का नाम जोड़ें। कुल 108 बार मंत्र का जप कर सामग्री को पूर्णतः सिद्ध (अभिमंत्रित) करें।
प्रयोग क्रिया: सिद्ध की गई सामग्री को गुप्त रूप से शत्रु के भोजन या पेय पदार्थ में मिला दें।
प्रभाव: भोजन ग्रहण करने के कुछ ही मिनटों के भीतर मंत्र अपना प्रचंड प्रभाव दिखाना शुरू कर देता है।
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