यह प्रयोग प्राचीन बंगाली तंत्र पद्धति पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य किसी भी महत्वपूर्ण सभा, गोष्ठी, राज-दरबार, व्यापारिक बैठक या जनसमूह को अपने अनुकूल बनाना है। इसके नित्य एवं विधिपूर्वक प्रयोग से साधक के व्यक्तित्व में एक विशेष आकर्षण और सम्मोहन शक्ति का संचार होता है, जिससे समाज में प्रतिष्ठा और प्रभाव में वृद्धि होती है।
Mandatory Chanting (अनिवार्य जप संख्या): इस मंत्र का कुल 7 बार पूर्ण एकाग्रता के साथ पाठ करना अनिवार्य है।
तिलक निर्माण हेतु निम्नलिखित पवित्र सामग्रियों को समान मात्रा में एकत्रित करें:
शुद्ध हल्दी, अगर, तगर, कपिला गाय का दूध, कपूर, संगरूफ, कुमकुम, सिंदूर, केसर।
उत्तम श्रेणी का सुगंधित गुलाब जल और गंगाजल।
एकत्रित सामग्रियों को गंगाजल या शुद्ध जल की कुछ बूंदों के साथ मिलाकर एक महीन और तिलक लगाने योग्य पेस्ट तैयार करें। मिश्रण बनाते समय मन को पूर्णतः शांत और एकाग्र रखें।
तैयार तिलक पात्र को अपने सम्मुख रखकर धूप-दीप प्रज्वलित करें। इसके पश्चात, ऊपर दिए गए मूल मंत्र का अत्यंत स्पष्ट और शुद्ध रूप से 7 बार सस्वर पाठ करें। प्रत्येक पाठ के साथ अपनी सकारात्मक ऊर्जा का ध्यान तिलक पर केंद्रित करें।
जब तिलक पूर्णतः अभिमंत्रित हो जाए, तब अपने दाहिने हाथ की अनामिका उंगली (Ring Finger) से तिलक को लेकर अपने मस्तक (ललाट के मध्य भाग) पर श्रद्धापूर्वक धारण करें।
इस तिलक को धारण कर जब साधक किसी जनसमूह, साक्षात्कार या महत्वपूर्ण बैठक में प्रवेश करता है, तो वातावरण स्वतः ही अनुकूल होने लगता है और उपस्थिति जनसमूह पर विशेष आकर्षण का प्रभाव पड़ता है।
Pronunciation Accuracy (उच्चारण की शुद्धता): मंत्र विज्ञान ध्वनि-आधारित शास्त्र है। शब्दों का सटीक उच्चारण अनिवार्य है; उच्चारण में कोई भी त्रुटि इसके प्रभाव को निष्फल कर सकती है।
Sattvic Focus (मानसिक शुद्धता): इस साधना को पूर्ण मानसिक शुद्धि, सात्विकता और एकाग्रता के साथ करना ही सफलता का मूल आधार है।
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