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प्रत्यक्ष सिद्ध कुंडलवती भूतनी साधना
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प्रत्यक्ष सिद्ध कुंडलवती भूतनी साधना: तंत्र मार्ग की उच्चतम और तीव्र साधना

"साहस, संकल्प और गुरु-आज्ञा—अदृश्य शक्तियों के साक्षात्कार का गुप्त मार्ग।"

तंत्र जगत में कुछ साधनाएँ ऐसी होती हैं जो न केवल अलौकिक शक्तियों का साक्षात्कार कराती हैं, बल्कि साधक को जीवन के हर मोड़ पर एक सशक्त मार्गदर्शक भी प्रदान करती हैं। 'प्रत्यक्ष सिद्ध कुंडलवती भूतनी साधना' एक ऐसी ही अत्यंत प्रभावशाली और तीव्र तामसिक श्रेणी की साधना है। यद्यपि यह शक्ति प्रेत योनि से संबंधित है, परंतु पूर्ण समर्पण, अटूट विश्वास और गुरु के प्रत्यक्ष दिशा-निर्देशन में यह साधना साधक के लिए अत्यंत सुरक्षित, फलदायी और कल्याणकारी सिद्ध होती है।

साधना के दिव्य लाभ

यह साधना साधक को एक अभेद्य सुरक्षा चक्र प्रदान करने के साथ-साथ जीवन में स्पष्टता लाती है:

  • पूर्ण सुरक्षा कवच: सिद्धि प्राप्ति के बाद, यह शक्ति साधक और उनके संपूर्ण परिवार की आजीवन हर नकारात्मकता और संकट से रक्षा करती है।

  • त्रिकाल ज्ञान: साधक भूत, भविष्य और वर्तमान से जुड़े किसी भी जटिल या गुप्त प्रश्न का सटीक उत्तर जानने में सक्षम हो जाता है।

  • असाध्य में सहायक: यह शक्ति अन्य उच्च स्तरीय और जटिल साधनाओं में साधक का मार्गदर्शन करती है और सफलता सुनिश्चित कराती है।

  • इच्छा पूर्ति: इस सिद्धि के सहयोग से साधक जीवन की अन्य दुर्लभ सिद्धियों को सुगमता से प्राप्त कर सकता है।

साधना काल, स्थान एवं अनिवार्य नियम

विषयनियम व निर्देश
शुभ मुहूर्तहोली अथवा दीपावली की महानिशा (एक दिवसीय साधना)।
साधना स्थलनिर्जन श्मशान भूमि।
दिशादक्षिण (South) की ओर मुख करके।
आसन व वस्त्रकाला आसन, काले वस्त्र और सिर पर काले रंग का फेटा (पगड़ी)।
जाप संख्याएक ही रात्रि में मंत्र का 8,000 बार जाप अनिवार्य है।
मालारुद्राक्ष की माला (जाप के समय माला काले रंग की गोमुखी/झोली में होनी चाहिए)।

पूजन सामग्री एवं सुरक्षा व्यवस्था

  • भोग: मिट्टी के नए पात्र (सकोरा) में उत्तम श्रेणी की मदिरा।

  • दीपक: तिल के तेल का अखंड दीपक। श्मशान की तीव्र हवा से बचाने के लिए इसे लोहे की जालीदार लालटेन या हवा-रोधी कवर में रखें। साधना काल में दीपक का प्रज्वलित रहना अनिवार्य है।

  • व्यवस्था: समस्त सामग्री (भोग व दीपक) सुरक्षा घेरे के अंदर ही स्थापित की जानी चाहिए।

साधना की अनिवार्य प्रक्रिया एवं सुरक्षा नियम

  1. रक्षा घेरा (किलेबंदी): साधना प्रारंभ करने से पूर्व गुरु द्वारा प्रदत्त सुरक्षा मंत्र और रक्षा घेरे का निर्माण करना परम आवश्यक है। इसके बिना श्मशान में बैठना वर्जित है।

  2. मानसिक दृढ़ता: साधना के दौरान कई भयानक दृश्य, डरावनी आवाजें या मायावी प्रलोभन आ सकते हैं। साधक को अपना विश्वास अटल रखना है; किसी भी परिस्थिति में भयभीत होकर आसन न छोड़ें।

  3. घेरे की मर्यादा: जब तक साधना पूर्ण न हो और प्रत्यक्ष प्रकटीकरण के बाद 'तीन वचन' न लिए जाएं, शरीर का कोई भी अंग सुरक्षा घेरे से बाहर न निकालें।

प्रत्यक्ष प्रकटीकरण एवं 'तीन वचन' की विधि

जब कुंडलवती भूतनी प्रत्यक्ष रूप से प्रकट हो, तब साधक को बिना डरे, दृढ़ता से निम्नलिखित तीन वचन लेने चाहिए:

पहला वचन: "जब भी मैं आपको याद करूँगा, आपको आना होगा और जो भी कार्य मैं बोलूँगा, वह आपको करना पड़ेगा।"

दूसरा वचन: "आप आजीवन मेरी और मेरे संपूर्ण परिवार की हर संकट से रक्षा करेंगी।"

तीसरा वचन: "मुझसे पूछे बिना या मेरी आज्ञा के बिना आप स्वयं से कोई भी कार्य (शुभ या अशुभ) नहीं करेंगी।"

महत्वपूर्ण: इन तीन वचनों की पुष्टि के बाद ही साधक को सुरक्षा घेरे से बाहर आकर मिट्टी के पात्र में रखी मदिरा का भोग समर्पित करना चाहिए।

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