यह एक अत्यंत तीव्र तांत्रिक प्रयोग है। इसका मुख्य उद्देश्य अग्नि के दाहक (जलाने वाले) प्रभाव को नियंत्रित/स्तंभित करना और प्रचंड अग्नि के बीच भी शरीर की पूर्ण रक्षा सुनिश्चित करना है।
साधना की सफलता के लिए साधक को पूर्ण निष्ठा, सात्विकता और पवित्रता के साथ इस मंत्र का 1,00,000 (एक लाख) बार जप करना अनिवार्य है। एक लाख जप पूर्ण होने पर ही यह मंत्र पूर्णतः सिद्ध (जागृत) माना जाता है।
मंत्र सिद्ध हो जाने के पश्चात, साधक के भीतर अग्नि के प्रति अभेद्यता (Immunity to fire) उत्पन्न हो जाती है।
प्रभाव: सिद्ध मंत्र के प्रभाव से साधक को अग्नि का भय नहीं रहता। यदि साधक जलते हुए खैर (खदीर) के अंगारों या प्रज्वलित लकड़ियों की प्रचंड अग्नि के बीच भी प्रवेश करे, तो उसके शरीर को अग्नि से किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुँचती।
Sattvic Discipline (सात्विक अनुशासन): इस साधना के दौरान ब्रह्मचर्य, आहार-विहार में संयम और मानसिक पवित्रता बनाए रखना अनिवार्य है।
Caution (सावधानी): तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, ऐसी सिद्धियों का प्रयोग केवल विशेष परिस्थितियों में ही करना चाहिए। अग्नि से संबंधित प्रयोग अत्यंत संवेदनशील होते हैं, अतः पूर्ण सिद्धि से पूर्व इनका परीक्षण न करें।
यह विद्या अग्नि तत्व को वश में करने (अग्नि बंधन) की एक प्राचीन विधि है। पूर्ण श्रद्धा और विधि के पालन से साधक को तत्व-सिद्धि प्राप्त होती है।
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