क्या आप ब्रह्मांड के गुप्त रहस्यों और समय की सीमाओं के पार देखना चाहते हैं? तंत्र शास्त्र के उच्च ग्रंथों में "कर्ण ज्ञान त्रिकालदर्शी महायक्षिणी साधना" को एक अत्यंत प्रामाणिक और प्रत्यक्ष श्रेणी की साधना माना गया है। इस साधना का मुख्य उद्देश्य कर्ण ज्ञान (कान में भूत, भविष्य और वर्तमान की सटीक जानकारी ध्वनि रूप में प्राप्त होना) तथा त्रिकालदर्शी बोध की प्राप्ति है।
वर्तमान समय के अनुसार तैयार किया गया यह विधान पूरी तरह सुरक्षित है, जिससे साधक के परिवार या वंश पर किसी भी प्रकार का दोष या नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।
🌟 सफलता की त्रिशक्ति: गुरु वचनों पर अखंड विश्वास, अथक परिश्रम, और अपने कर्म के प्रति पूर्ण श्रद्धा। यदि ये तीनों नियम आपके पास हैं, तो यह प्रत्यक्ष श्रेणी की साधना कुछ ही दिनों में सिद्ध हो जाती है।
महायक्षिणी साधना की सफलता के लिए इन कड़े नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
पूर्ण गोपनीयता (Gupt Sadhana): हर उच्च कोटि की साधना की तरह इसे भी पूर्णतः गुप्त रखना है। साधना करने की बात, साधना काल के अनुभव या अपने साथ बीती किसी भी अलौकिक घटना को किसी भी व्यक्ति से साझा (Share) न करें।
सुरक्षा कवच: साधना काल में शरीर सुरक्षा और 'सुरक्षा घेरा मंत्र' अनिवार्य रूप से सिद्ध करके लगा लेना है (जिसका विधान अलग से दिया जाता है)।
बाहरी वस्तुओं का निषेध: सुरक्षा मंत्र और घेरे के अलावा, साधना के दौरान शरीर पर किसी भी प्रकार का गंडा, ताबीज, या अन्य कोई माला धारण नहीं करनी है।
आलस्य का त्याग: यह पूर्णतः रात्रि कालीन साधना है, इसलिए निद्रा और आलस्य का पूर्ण परित्याग करके एकाग्रचित्त होना अनिवार्य है।
यह साधना एक विशेष समय और प्राकृतिक ऊर्जा के केंद्र पर ही संपन्न की जाती है:
| विषय | प्रामाणिक एवं उत्तम विधान |
| सर्वोत्तम मास | आषाढ़ महीने की पूर्णिमा से आरंभ करके पूरे श्रावण मास में करना सर्वश्रेष्ठ है। |
| वैकल्पिक दिन | यदि श्रावण मास में न हो सके, तो किसी भी महीने के गुरुवार (Thursday) से इसे शुरू करें। |
| सटीक समय | रात्रि १२:०० बजे से लेकर सुबह ३:०० बजे तक (यह ३ घंटे का समय सबसे शुद्ध और ऊर्जावान होता है)। |
| साधना स्थल | एकांत स्थान पर स्थित पुराने से पुराना बेल का वृक्ष (बिल्व पेड़), जो भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। |
आसन व वस्त्र: साधक के वस्त्र और बैठने का आसन दोनों अनिवार्य रूप से लाल रंग के होने चाहिए।
जाप माला: मंत्र जाप के लिए केवल सिद्ध रुद्राक्ष की माला का ही प्रयोग करें।
अनिवार्य भोग: चूँकि यह यक्ष श्रेणी की तीव्र और प्रत्यक्ष साधना है, इसलिए साधना काल में मांस और मदिरा (शराब) का भोग अनिवार्य रूप से अर्पित किया जाता है।
साधना की शुरुआत करने से पहले भगवान शिव के परम मित्र और यक्षों के राजा, यक्षराज कुबेर का आशीर्वाद लेना आवश्यक है ताकि महायक्षिणी साधना निर्विघ्न संपन्न हो सके।
महायक्षिणी मंत्र का जाप शुरू करने से पहले नित्य १०८ बार (१ माला) कुबेर मंत्र का जाप करें। यह मंत्र महायक्षिणी को साधक के अनुकूल बनाता है और परिवार की बाहरी बाधाओं व दुश्मनों से रक्षा करता है।
कुबेर मंत्र के बाद, एकांतचित्त होकर नित्य रात्रि १२:०० से ३:०० के बीच मुख्य महामंत्र का ३५०० बार पूर्ण स्पष्ट उच्चारण के साथ जाप करना होता है।
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