अक्सर ऐसा देखा गया है कि जब कोई व्यक्ति किसी ऊपरी बाधा या प्रेत-आत्मा से ग्रसित होता है, तो वह पीड़ित व्यक्ति अपनी स्थिति के बारे में सच नहीं बताता। वह प्रेत-आत्मा उसे डराती है या बोलने से रोकती है। ऐसी विकट परिस्थिति में, जब सभी उपाय विफल हो जाते हैं, तब 'कालभैरव दाना' एक अत्यंत शक्तिशाली और जागृत साधन के रूप में कार्य करता है।
उपयोग विधि: इस प्रक्रिया में एक गोहरी (गाय के गोबर से बना उपला) को विधिवत जलाया जाता है। जब गोहरी पूरी तरह दहक उठे, तब उस पर 'कालभैरव दाना' की आहुति दी जाती है। इस प्रक्रिया से जो विशेष धुआं उत्पन्न होता है, उसे अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।
इसका प्रभाव: जैसे ही यह सिद्ध धुआं प्रेत-बाधा से प्रभावित व्यक्ति की नाक के माध्यम से उसके भीतर प्रवेश करता है, उस धुआं की तीक्ष्णता और भैरव-शक्ति के प्रभाव से वह प्रेत-आत्मा तड़पने लगती है। यह धुआं उस नकारात्मक शक्ति को उग्र (Agitated) कर देता है, जिससे वह अपने अस्तित्व को छिपा नहीं पाती। परिणामस्वरूप, वह प्रेत-आत्मा पीड़ित व्यक्ति के माध्यम से ही सब लोगों के सामने अपनी पूरी सच्चाई, अपना नाम और आने का कारण उगलने को विवश हो जाती है।
सावधानी: यह अत्यंत तीव्र प्रयोग है, अतः इसे किसी विशेषज्ञ या जानकार व्यक्ति के मार्गदर्शन में ही करना उचित है।
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