यह विवरण सनातन संस्कृति की एक अत्यंत गोपनीय और प्रभावशाली शाबर मंत्र साधना पर आधारित है। इस साधना का मुख्य उद्देश्य अपने वंश व कुल के रक्षक शक्तियों—अर्थात कुलदेवी या कुलदेवता—का आवाहन करना, उनकी सोई हुई कृपा को जागृत करना और जीवन में आ रही बाधाओं से मुक्ति पाना है। शाबर मंत्र अपनी सरल भाषा और अचूक प्रभाव के लिए जाने जाते हैं, और यह साधना श्रद्धापूर्वक करने से साधक को अपने कुल की दैवीय शक्तियों का साक्षात् आशीर्वाद प्राप्त होता है।
साधना को सफल बनाने के लिए शास्त्रों और परंपरा के अनुसार निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
शुभ दिन: इस साधना की शुरुआत किसी भी शनिवार या सोमवार से की जा सकती है।
साधना अवधि: यह एक दैनिक (रोजाना) की जाने वाली साधना है।
शुभ समय: इसके लिए रात्रि का समय सबसे उपयुक्त माना गया है। रात १०:०० बजे के बाद एकांत में इसे शुरू करें।
दिशा व आसन: साधना के समय आपका मुख पूर्व दिशा (East) की ओर होना चाहिए। बैठने के लिए काले रंग के आसन और पहनने के लिए काले वस्त्रों का प्रयोग करें।
जाप माला: मंत्रों की ऊर्जा को संचित करने के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग अनिवार्य है।
साधना की वेदी तैयार करने के लिए निम्नलिखित शुद्ध सामग्रियां पहले से एकत्रित कर लें:
भोग सामग्री: ७ साबुत पान के पत्ते (कटे-फटे न हों), १४ साबुत लौंग, ७ छोटी इलायची, और ७ बेसन या बूंदी के लड्डू।
पात्र: एक तांबे या पीतल का लोटा, जिसमें शुद्ध जल भरा हो।
धूप-दीप: ५ अगरबत्ती और एक मिट्टी या धातु का दो मुखी दीपक (जिसमें दो बत्तियां जलती हों)।
हवन सामग्री: एक छोटा हवन कुंड, आम की सूखी लकड़ियां (समिधा) या गाय का उपला, शुद्ध गाय का घी और कलावा/हवन सामग्री।
इस साधना को पूरी पवित्रता और एकाग्रता के साथ निम्नलिखित ५ चरणों में संपन्न किया जाता है:
रात १०:०० बजे के बाद स्नान करके स्वच्छ काले वस्त्र धारण करें। अपने साधना कक्ष या घर के किसी एकांत कोने को साफ करें और पूर्व मुखी होकर काले आसन पर बैठ जाएं।
अपने ठीक सामने दो मुखी दीपक प्रज्वलित करें और ५ अगरबत्तियां जलाएं ताकि वातावरण सुगंधित और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाए। सम्मुख ही शुद्ध जल से भरा लोटा स्थापित करें।
जमीन पर या एक साफ चौकी पर ७ पान के पत्ते पंक्तिबद्ध रखें। प्रत्येक पान के पत्ते के ऊपर २ लौंग, १ इलायची और १ लड्डू रखें। इस प्रकार कुल ७ पत्तों पर सारा भोग सजाकर अपने कुलदेवता/कुलदेवी को मानसिक रूप से अर्पित करें।
हाथ में रुद्राक्ष की माला लेकर, शांत चित्त से मूल शाबर मंत्र का १०८ बार (१ माला) जाप करें।
विशेष ध्यान दें: मंत्र पढ़ते समय जहाँ कोष्ठक
[यहाँ कुलदेवी/कुलदेवता का नाम लें]दिया गया है, वहाँ अपने वास्तविक कुलदेवी या कुलदेवता का नाम पूरी श्रद्धा से स्पष्ट उच्चारण के साथ लें।
जाप पूर्ण होने के बाद, हवन कुंड में आम की लकड़ी या उपला जलाकर अग्नि प्रज्वलित करें। इसके बाद, उसी शाबर मंत्र को पढ़ते हुए, मंत्र के अंत में 'स्वाहा' बोलकर २१ बार घी और हवन सामग्री से अग्नि में आहुति दें।
पूर्ण ब्रह्मचर्य: जब तक यह साधना चले, साधक को मन, वचन और कर्म से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
परम गोपनीयता: शाबर मंत्रों की शक्ति गोपनीयता में ही निहित होती है। साधना के दौरान होने वाले अनुभवों, दृश्यों या आभास की चर्चा किसी भी बाहरी व्यक्ति या मित्र से भूलकर भी न करें।
एकाग्रता और समर्पण: साधना काल में अपना पूरा ध्यान अपनी कुल शक्तियों के आवाहन और माँ काली की शक्ति पर केंद्रित रखें, क्योंकि शाबर मंत्रों की रक्षक और संचालक शक्तियां अक्सर मां काली या शिव जी से जुड़ी होती हैं।
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