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चिंतामणि गणेश साधना
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यह मंत्र भगवान गणेश के चिंतामणि स्वरूप की साधना का अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली मंत्र है। चिंतामणि का अर्थ है—वह रत्न जो हर चिंता को मिटाकर मनचाहा फल प्रदान करे।

इस मंत्र में बीज मंत्रों (ॐ, ह्रीं, श्रीं) का संपुट लगा है, जो इसे लक्ष्मीदायक और सौभाग्यवर्धक बनाता है। यहाँ इस साधना की संपूर्ण विधि और नियम दिए गए हैं:

1. साधना का महत्व और लाभ

यह साधना मुख्य रूप से निम्नलिखित फलों के लिए की जाती है:

 * वांछितार्थ पूर्ति: मन की दबी हुई इच्छाओं को पूरा करना।

 * लक्ष्मी प्राप्ति: व्यापार में वृद्धि और आर्थिक तंगी से मुक्ति।

 * ऋद्धि-सिद्धि: घर में सुख, शांति और मानसिक स्पष्टता का आगमन।

 * संकट नाश: पुरानी चिंताओं और शत्रुओं की बाधाओं का अंत।

2. साधना विधि और नियम

साधना की सफलता आपकी श्रद्धा और अनुशासन पर निर्भर करती है।

 * शुभ मुहूर्त: यह साधना किसी भी बुधवार, गणेश चतुर्थी या पुष्य नक्षत्र से शुरू करना श्रेष्ठ होता है।

 * आसन और दिशा: पीले या लाल रंग के आसन का प्रयोग करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।

 * स्थापना: गणेश जी की प्रतिमा या यंत्र के सामने घी का दीपक जलाएं। लाल फूल (खासकर गुड़हल) और दूर्वा (घास) अर्पित करें।

 * माला: इस मंत्र के जाप के लिए लाल चंदन की माला या रुद्राक्ष की माला का उपयोग करें।

 * समय: सबसे उत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 से 6) है, लेकिन यदि संभव न हो तो सूर्यास्त के समय भी किया जा सकता है। समय रोज एक ही रखें।

3. संकल्प और जाप संख्या

किसी भी साधना से पहले हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि आप यह जाप अपनी किस इच्छा के लिए कर रहे हैं।

 * लघु साधना: 11 माला प्रतिदिन (11 दिनों तक)।

 * पूर्ण अनुष्ठान: 1.25 लाख जाप (सवा लाख), जिसे आप 21 या 41 दिनों में विभाजित कर सकते हैं।

 * नित्य पूजा: यदि आप सामान्य लाभ चाहते हैं, तो प्रतिदिन 1 या 3 माला पर्याप्त है।

4. परहेज और सावधानियां (अनुशासन)

साधना के दौरान ऊर्जा को संचित करने के लिए इन नियमों का पालन अनिवार्य है:

 * शुद्ध आहार: मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का त्याग करें (सात्विक भोजन)।

 * ब्रह्मचर्य: साधना काल के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

 * मौन और आचरण: कम बोलें, झूठ न बोलें और किसी की बुराई न करें।

 * स्वच्छता: स्नान के उपरांत साफ (धुले हुए) सूती वस्त्र पहनकर ही बैठें।

5. मंत्र का सही उच्चारण

मंत्र को लयबद्ध और स्पष्ट पढ़ें:

> "ॐ ह्रीं श्रीं चिंतामणि गणपते वांछितार्थ पूरय पूरय लक्ष्मीदायक ऋद्धिं वृद्धिं कुरू कुरू सर्वसौख्यं सौभाग्यं कुरू कुरू स्वाहा श्रीं ह्रीं ॐ"

विशेष सुझाव

साधना के अंतिम दिन किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं या छोटी कन्याओं को कुछ मीठा खिलाकर उनका आशीर्वाद लें। इससे साधना पूर्ण मानी जाती है।

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