शत्रु बाधा निवारण और असाध्य संकटों से मुक्ति हेतु भगवती पीताम्बरा (मां बगलामुखी) की साधना अचूक मानी जाती है। इस वीडियो/सामग्री में मां बगलामुखी के प्राचीन, अत्यंत गोपनीय और तीव्र 'शत्रु-विध्वंसन प्रयोग' की प्रामाणिक विधि का वर्णन किया गया है। यह विधान गुरु-परंपरा पर आधारित है, जिसका उपयोग केवल धर्म रक्षार्थ और आत्मरक्षार्थ ही किया जाना चाहिए।
इस दुर्लभ तांत्रिक अनुष्ठान को पूर्ण करने के लिए विशेष और दुर्लभ सामग्रियों की आवश्यकता होती है, जिनका विवरण इस प्रकार है:
दुर्लभ श्मशान सामग्री: श्मशान के घड़े का ठीकरा (पेंदी), विशेष नक्षत्र (मूल, आर्द्रा या भरणी) में लाई गई श्मशान की मिट्टी से निर्मित दीपक, और शनिवार की चिता का अभिमंत्रित कोयला।
तांत्रिक स्याही व लेखनी: चिता भस्म (कोयला चूण) और हरताल के मिश्रण से बनी विशेष स्याही एवं नीम की लकड़ी से निर्मित कलम।
साधक की वेशभूषा व अनुष्ठान: साधक के लिए पीले वस्त्र, पीला चंदन, सरसों या तिल के तेल का दीपक (चिता के वस्त्र की बत्ती के साथ), और उड़द की दाल का आसन।
यंत्र निर्माण व मन्त्र जप: मानव आकृति पर मां बगलामुखी के वलोम मन्त्र (ह्ल्रीं) और शत्रु नाम का अंकन करके 10 माला का तीव्र जप।
शत्रु का दमन: इस विधि के प्रभाव से बड़े से बड़े शत्रुओं का समूह और अदृश्य बाधाएं इस प्रकार नष्ट हो जाती हैं जैसे अग्नि में सूखी घास।
स्थिर लौ (सफलता का प्रतीक): यदि साधना के दौरान दीपक की लौ बिना हिले बिल्कुल सीधी रहे, तो यह कार्य की तत्काल सफलता का संकेत है।
कांपती लौ (विलम्ब का संकेत): यदि लौ लगातार कांपे या तेल में बुलबुले उठें, तो कार्य में कुछ समय या बाधा आने की संभावना होती है।
कौतूहल या मनोरंजन वर्जित: यह एक अत्यंत उग्र और गोपनीय तांत्रिक विधान है। इसे केवल कौतूहलवश, मनोरंजन के लिए या किसी को अकारण क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से कदापि न करें।
गुरु मार्गदर्शन अनिवार्य: किसी भी प्रकार की त्रुटि या गलत उच्चारण से साधक को स्वयं हानि हो सकती है। अतः यह प्रयोग केवल किसी योग्य और प्रामाणिक तांत्रिक गुरु के प्रत्यक्ष निर्देशन व संरक्षण में ही संपन्न किया जाना चाहिए।
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