सावधान: यह एक अत्यंत शक्तिशाली और गोपनीय तांत्रिक साधना है। इसे केवल अति-विकट और अनिवार्य परिस्थितियों में ही उपयोग के लिए साझा किया जा रहा है।
इस प्रयोग का उपयोग करने से पहले निम्नलिखित निर्देशों को ध्यान से पढ़ें:
अंतिम विकल्प: इस साधना का उपयोग तभी करें जब सामाजिक, प्रशासनिक और कानूनी सभी रास्ते बंद हो चुके हों और आत्मरक्षा का कोई अन्य उपाय न बचा हो।
दुरुपयोग वर्जित: सामान्य वाद-विवाद, व्यक्तिगत रंजिश, या किसी को परेशान करने के उद्देश्य से किया गया प्रयोग साधक के लिए घातक हो सकता है। बिना ठोस कारण के प्रयोग करने पर साधक स्वयं माँ दुर्गा और चंडी के कोप का भागी बन सकता है।
जिम्मेदारी: इस प्रयोग से उत्पन्न होने वाले किसी भी नकारात्मक परिणाम, कानूनी जटिलता या दैवीय प्रभाव के लिए साधक स्वयं उत्तरदायी होगा। वेबसाइट या इसके संचालक किसी भी प्रकार की क्षति के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
यह साधना एकाग्रता और पूर्ण विश्वास की मांग करती है।
1. पुतले का निर्माण: किसी चौराहे या तिराहे की मिट्टी लेकर उसमें शुद्ध सरसों का तेल मिलाएं और एक मानव आकृति (पुतला) तैयार करें। शत्रु के लिंग के अनुसार आकृति बनाएं और उसके मुख पर शत्रु का स्पष्ट फोटो चिपकाएं।
2. मंत्र अभिमंत्रण: पुतले को सामने रखकर एकाग्रचित्त होकर बैठें। दिए गए मंत्र का 108 बार स्पष्ट उच्चारण के साथ जप करें।
विशेष निर्देश: प्रत्येक मंत्र जप के अंत में एक तीव्र 'फूँक' पुतले पर मारें। कुल 108 मंत्रों के साथ 108 बार फूँक मारना अनिवार्य है।
3. बाण (कील) का प्रयोग: लोहे की 7 नुकीली कीलें लें, जिन्हें घिसकर तीर जैसा तीक्ष्ण बनाया गया हो। मंत्र जप पूर्ण होने के बाद, इन तीरों को पुतले के संवेदनशील अंगों पर चुभाएं और उन्हें कुछ समय या पूरी रात के लिए वैसे ही छोड़ दें।
यह प्रयोग शत्रु के शरीर में असहनीय और असामान्य पीड़ा उत्पन्न करने में सक्षम है। यदि शत्रु मानसिक या शारीरिक रूप से कमजोर है, तो इसके परिणाम प्राणघातक हो सकते हैं। अतः अत्यंत सूझ-बूझ और विवेक के साथ ही आगे बढ़ें।
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