किसी भी साधना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि साधक का आसन कितना ऊर्जावान और सुरक्षित है। शाबर विद्या में 'आसन मंत्र' एक शक्तिशाली कवच के समान है, जो न केवल बैठने के स्थान को पवित्र करता है, बल्कि साधक को आध्यात्मिक रूप से भी स्थिर और सुरक्षित रखता है।
यह शाबर मंत्र 'स्वयंसिद्ध' स्वरूप में है, जिसका अर्थ है कि इसे किसी जटिल अनुष्ठान द्वारा सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। मात्र पूर्ण श्रद्धा के साथ इसे कंठस्थ कर लेने से ही यह चैतन्य हो जाता है। यह मंत्र साधना काल में साधक और भूमि के बीच एक दिव्य संबंध स्थापित करता है, जिससे पंचतत्वों का संतुलन बना रहता है।
आसन का शुद्धिकरण: मंत्र के प्रभाव से भौतिक आसन एक सिद्ध 'दिव्य पीठ' में परिवर्तित हो जाता है, जो नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर रखता है।
अध्यात्मिक सुरक्षा: गुरु गोरखनाथ जी की कृपा से यह मंत्र साधक के चारों ओर एक सूक्ष्म सुरक्षा कवच का निर्माण करता है, जिससे साधना में किसी भी प्रकार का विघ्न नहीं आता।
पाप एवं नकारात्मकता का नाश: इस विधि को अपनाकर बैठने वाले साधक के व्यक्तित्व में एक ऐसी सात्विकता का संचार होता है, जो आसपास के वातावरण को भी शुद्ध कर देती है।
यह मंत्र अत्यंत सरल है, जिसे दैनिक पूजा या साधना से पूर्व इस प्रकार अपनाएं:
स्थापना: अपना आसन (कुशा, ऊनी या अन्य) पूर्व या उत्तर दिशा की ओर बिछाएं।
स्पर्श एवं उच्चारण: आसन पर बैठने से पूर्व, अपना दाहिना हाथ आसन पर रखें और मंत्र का १, ३, या ७ बार स्पष्ट उच्चारण करें।
आह्वान: मंत्र जप के पश्चात आसन को प्रणाम करें। यह क्रिया आपके आसन को 'जाग्रत' करने के लिए पर्याप्त है।
विशेष संदेश: शाबर मंत्रों की शक्ति 'अटूट विश्वास' में छिपी होती है। जब आप अपने आसन को प्रणाम कर इस मंत्र का पाठ करते हैं, तो आप स्वयं को गुरु और ईश्वरीय सत्ता के संरक्षण में समर्पित कर रहे होते हैं। यह छोटी सी क्रिया आपकी साधना की प्रभावशीलता को कई गुना बढ़ा देती है।
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